मेरे विवाह के कारण मैं परेशान हूँ

विवाह से संबंधित अनेक समस्‍याएं हो सकती हैं । वैवाहिक संबंधों में समस्‍याओं के निराकरण के लिए उपलब्‍ध संरक्षण उपायों की संकेतात्‍मक सूची इस प्रकार है :

 

दहेज से संबंधित अपराध

  •  दहेज निषेध अधिनियम, 1961 के अनुसार (क्‍यूएल14 का लिंक), दहेज का अर्थ है विवाह के समय, उससे पूर्व और उसके पश्‍चात किसी भी समय दूल्‍हे को दुल्‍हन द्वारा अथवा दुल्‍हन को दूल्‍हे द्वारा अथवा दुल्‍हन या दूल्‍हे के माता-पिता द्वारा अथवा किसी अन्‍य व्‍यक्‍ति द्वारा दी गई अथवा दिए जाने पर सहमति प्राप्‍त कोई संपत्‍ति अथवा बहुमूल्‍य सुरक्षा ।
  • अधिनियम के अनुसार, दहेज देना, लेना, मांगना अथवा यहां तक कि विज्ञापित करना एक अपराध है । . इनमें से किसी भी उल्‍लंघन के लिए 6 माह से 5 वर्ष तक के कारावास और जुर्माने के दंड का प्रावधान है ।
  • बहुत सी महिलाओं के साथ दहेज को लेकर या अन्‍यथा उनके पतियों और पति के सगे-संबंधियों द्वारा निर्दयतापूर्ण व्‍यवहार किया जाता है । भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के अनुसार, ऐसे मामलों में 3 वर्ष तक के कारावास और जुर्माने के दंड का प्रावधान है ।
  • दहेज मृत्‍यु का अर्थ है महिला के विवाह के 7 वर्षों के भीतर जलने, घायल होने या किसी अन्‍य अप्राकृतिक कारण से महिला की मृत्‍यु हो जाना । शर्त यह है कि महिला की मृत्‍यु से पूर्व उसके साथ दहेज को लेकर उसके पति और पति के सगे-संबंधियों द्वारा निर्दयतापूर्ण व्‍यवहार किया गया हो । यह सिद्ध करने का दायित्‍व पति और महिला के ससुराल पक्ष का है कि महिला की मृत्‍यु उनके गलत व्‍यवहार के कारण नहीं हुई । इसके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 304बी के तहत 7 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास के दंड का प्रावधान है ।

 

घर के भीतर हिंसा

  • घरेलू हिंसा घर के भीतर ऐसे लोगों द्वारा महिलाओं के साथ किसी भी प्रकार की शारीरिक, यौन, भावनात्‍मक, आर्थिक हिंसा करना है, जिनका महिला के साथ पारिवारिक संबंध हो (जन्‍म का और वैवाहिक परिवार दोनों शामिल हैं) ।
  • महिलाओं का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम (पीडब्‍ल्‍यूडीवीए), 2005 (क्‍यूएल15 का लिंक) में संरक्षण आदेश, आवास आदेश, बच्‍चों की अस्‍थायी अभिरक्षा, आर्थिक राहत और क्षतिपूर्ति आदेश के रूप में उपचार का प्रावधान है ।
  • पीडब्‍ल्‍यूडीवीए अधिनियम के अंतर्गत, संरक्षण आदेश का उल्‍लंघन एक वर्ष तक के कारावास अथवा 20,000/-रुपये तक के जुर्माने अथवा दोनों से दंडनीय है ।
  • निर्दयता जानबूझ कर किया गया कोई ऐसा व्‍यवहार है, जिससे महिला द्वारा आत्‍महत्‍या करने के लिए प्रवृत्‍त होने की संभावना हो अथवा महिला को गंभीर चोट या जीवन, किसी अंग या स्‍वास्‍थ्‍य (चाहे मानसिक अथवा शारीरिक) को खतरा हो; अथवा महिला या उसके किसी संबंधी को किसी गैर-कानूनी मांग को मनवाने के लिए महिला का उत्‍पीड़न किया जाए ।
  • भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए पति अथवा उसके सगे-संबंधियों द्वारा निर्दयता से संरक्षण प्रदान करती है । निर्दयता के लिए 3 वर्ष तक के कारावास और जुर्माने से दंडित किया जा सकता है ।

 

द्विविवाह - पति अथवा पत्‍नी के जीवित रहते पुन: विवाह करना

  • पति अथवा पत्‍नी के जीवित रहते जब कोई व्‍यक्‍ति दोबारा विवाह करता है तो इसे द्विविवाह कहा जाता है । एक पति और पत्‍नी के जीवित रहते इस प्रकार दोबारा किया गया विवाह अमान्‍य होता है ।
  • द्विविवाह के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 494 के तहत 7 वर्ष तक के कारावास और जुर्माने की सज़ा है ।
  • यह धारा ऐसे किसी व्‍यक्‍ति पर लागू नहीं है, जिसके पहले विवाह को न्‍यायालय द्वारा अमान्‍य घोषित किया जा चुका हो, अथवा ऐसे व्‍यक्‍ति पर जिसका पति या पत्‍नी कम से कम पिछले 7 वर्षों तक अनुपस्‍थित रहा/रही हो और जिसके जीवित होने के बारे में न सुना गया हो, परंतु दूसरा विवाह कराने वाले व्‍यक्‍ति को विवाह संपन्‍न होने से पूर्व विवाह सूत्र में बंधने वाले अपने पति या पत्‍नी को इसकी जानकारी देनी होगी ।

 

विधि-सम्‍मत विवाह के बगैर धोखाधड़ी से संपन्‍न कराया गया विवाह

  • बेईमानी से या धोखाधड़ी के इरादे से विवाह कराना (यह जानते हुए कि यह विवाह गैर-कानूनी है) अपराध है ।
  • इसके लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 496 के अंतर्गत 7 वर्ष तक कारावास और जुर्माना निर्धारित है ।

 

बाल विवाह

  • ऐसा विवाह, जिसमें लड़की की आयु 18 वर्ष से कम और लड़के की आयु 21 वर्ष से कम हो ।
  • बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम,2006 (क्‍यूएल 16 का लिंक) के अंतर्गत ऐसे व्‍यक्‍ति दंड के पात्र हैं, जो बाल विवाह को बढ़ावा देते हैं, उसका निष्‍पादन और उसके लिए अवप्रेरित करते हैं । 18 वर्ष से अधिक आयु का ऐसा व्‍यक्‍ति भी दंड का पात्र है, जो 18 वर्ष से कम आयु की लड़की से विवाह कराता है ।
  • बाल विवाह से पीड़ित व्‍यक्‍ति वयस्‍कता प्राप्‍ति के 2 वर्षों के भीतर इस प्रकार के विवाह को अमान्‍य घोषित कराने के लिए न्‍यायालय में आवेदन करा सकता है ।