अपने अधिकारों के बारे में जानें

आपराधिक कानून संशोधन अधिनियम (2013 सभी महिलाओं को यौन आक्रमण का मुकाबला करने के अधिकार देता है ।

1. पुलिस के लिए एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य है

पहले तो डरें नहीं । आप अकेले नहीं हैं - हम आपकी सहायता के लिए उपलब्‍ध हैं । आप अपने निकटतम पुलिस स्‍टेशन में एफआईआर दर्ज करा सकती हैं । कोई भी पुलिस अधिकारी एफआईआर दर्ज करने से मना नहीं कर सकता, चाहे बताया जा रहा अपराध उनके पुलिस स्‍टेशन के अधिकार क्षेत्र से बाहर ही क्‍यों न हो । अधिकारी एफआईआर दर्ज करने (इसे ज़ीरो एफआईआर कहा जाता है) और उसे संबंधित पुलिस स्‍टेशन को भेजने के लिए बाध्‍य है ।

 

2. बयान दर्ज करते समय निजता का अधिकार

आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 164 के अंतर्गत, बलात्‍कार की शिकार महिला के मामले की जब सुनवाई की जा रही हो तो वह जिला मजिस्‍ट्रेट के समक्ष अपना बयान रिकार्ड करा सकती है और उस समय किसी अन्‍य व्‍यक्‍ति के वहां उपस्‍थित होने की आवश्‍यकता नहीं है । विकल्‍प के तौर पर, वह अपना बयान केवल एक पुलिस अधिकारी और महिला सिपाही के सामने ऐसे सुविधाजनक स्‍थान पर दे सकती है, जहां भीड़भाड़ न हो और जहां किसी अन्‍य व्‍यक्‍ति द्वारा उसके बयान को सुने जाने की संभावना न हो । पुलिस को कानूनन महिला के निजता के अधिकार को बनाए रखना है ।

 

3. समय की कोई सीमा नहीं है

बलात्‍कार अथवा छेड़छाड़ की घटना के काफी समय बीत जाने के बाद भी पुलिस एफआईआर दर्ज करने से मना नहीं कर सकती । यदि पुलिस आपको यह कहती है कि आपने मामले की जानकारी पहले नहीं दी इसलिए एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती तो आप इसे स्‍वीकार न करें ।

 

4.बचाव के लिए ई-मेल

दिल्‍ली पुलिस द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, किसी महिला को ई-मेल अथवा पंजीकृत डाक से अपनी शिकायत दर्ज कराने का अधिकार है । यदि किसी कारणवश महिला पुलिस स्‍टेशन नहीं जा सकती है तो वह पुलिस उपायुक्‍त अथवा पुलिस आयुक्‍त के स्‍तर के वरिष्‍ठ पुलिस अधिकारी को संबोधित करते हुए ई-मेल अथवा पंजीकृत डाक से अपनी लिखित शिकायत भेज सकती है । इसके पश्‍चात अधिकारी घटना के क्षेत्र वाले पुलिस स्‍टेशन के एसएचओ को निदेश देता है कि वह शिकायतकर्ता का समुचित सत्‍यापन कराएं और एफआईआर दर्ज करें । इसके बाद, पुलिस पीड़िता का बयान दर्ज करने के लिए उसके आवास पर आ सकती है ।

 

5. पुलिस न नहीं कह सकती और शिकायत दर्ज न करने पर उन्‍हें दंडित किया जा सकता है

सर्वोच्‍च न्‍यायालय के ज़ीरो एफआईआर निर्णय के अनुसार, बलात्‍कार की शिकार महिला किसी भी पुलिस स्‍टेशन से अपनी शिकायत दर्ज करा सकती है । आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 में ऐसे सरकारी नौकरों को दंडित किए जाने का प्रावधान है, जो यौन आक्रमण की शिकार महिलाओं की शिकायत दर्ज करने से मना करते हैं ।

 

6. सूर्यास्‍त के पश्‍चात गिरफ्तारी नहीं

सर्वोच्‍च न्‍यायालय के एक निर्णय के अनुसार, किसी महिला को सूर्यास्‍त के पश्‍चात और सूर्योदय से पूर्व गिरफ्तार नहीं किया जा सकता । पुलिस किसी महिला को रात के समय गिरफ्तार नहीं कर सकती, चाहे पुलिस अधिकारी के साथ महिला सिपाही भी क्‍यों न हों । यदि महिला ने कोई गंभीर अपराध किया है, तो रात के समय गिरफ्तारी के कारण बताते हुए पुलिस को मजिस्‍ट्रेट से लिखित में अनुमति लेनी होगी ।

 

7. आपको पुलिस स्‍टेशन नहीं बुलाया जा सकता

आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 160 के अंतर्गत महिलाओं को पूछताछ के लिए पुलिस स्‍टेशन नहीं बुलाया जा सकता । यह कानून भारतीय महिलाओं को अधिकार देता है कि वे पूछताछ के लिए स्‍वयं पुलिस स्‍टेशन पर उपस्‍थित न हों । अबीद के अनुसार, ''पुलिस महिला से उसके निवास स्‍थान पर महिला सिपाही और महिला के परिवार के सदस्‍यों अथवा मित्रों की उपस्‍थिति में पूछताछ कर सकती है ।'' अत:, अगली बार किसी प्रकार के उत्‍पीड़न के मामले में यदि आपको पूछताछ और सवाल-जवाब के लिए पुलिस स्‍टेशन बुलाया जाता है, तो अपने अधिकार का इस्‍तेमाल करने के लिए आप सर्वोच्‍च न्‍यायालय के इस दिशा-निर्देश का हवाला दे सकती हैं और पुलिस को इसके बारे में बता सकती हैं ।

 

8. अपनी पहचान सुरक्षित रखें

किसी भी परिस्‍थिति में बलात्‍कार की शिकार महिला की पहचान को सार्वजनिक नहीं किया जा सकता । न तो पुलिस और न ही मीडिया पीड़ित महिला का नाम सार्वजनिक कर सकता है । भारतीय दंड संहिता की धारा 228-ए के अनुसार, पीड़ित महिला की पहचान बताना दंडनीय अपराध है । जिस महिला के साथ अपराध हुआ है, उसके नाम अथवा ऐसी किसी सामग्री का मुद्रण अथवा प्रकाशन दंडनीय है, जिससे उस महिला की पहचान उजागर हो । इसका उद्देश्‍य यौन अपराध की शिकार महिला का सामाजिक उत्‍पीड़न अथवा सामाजिक बहिष्‍कार रोकना है । यदि निर्णय उच्‍च न्‍यायालय अथवा निचले न्‍यायालय में लंबित भी क्‍यों न हो, तो भी पीड़ित महिला का नाम नहीं लिया जाता । उसे निर्णय में मात्र 'पीड़ित' कहा जाता है ।

 

9. डॉक्‍टर निर्णय नहीं ले सकता

बलात्‍कार के मामले को खारिज नहीं किया जा सकता, चाहे डॉक्‍टर यह कहें कि बलात्‍कार नहीं हुआ है । आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 164 ए के अनुसार, बलात्‍कार की शिकार महिला की डॉक्‍टरी जांच की जानी चाहिए और डॉक्‍टरी रिपोर्ट ही प्रमाण माना जा सकता है । भौमिक के अनुसार, 'महिला को डॉक्‍टर से चिकित्‍सा रिपोर्ट की प्रति मांगने का अधिकार है । बलात्‍कार अपराध है न कि चिकित्‍सीय दशा । यह कानूनी शब्‍द है, न कि पीड़ित महिला का इलाज करने वाले चिकित्‍सा अधिकारी द्वारा की जाने वाली पहचान । चिकित्‍सा अधिकारी द्वारा केवल एक ही बात की जा सकती है कि हाल ही में हुई यौन क्रिया का साक्ष्‍य उपलब्‍ध है । बलात्‍कार हुआ है अथवा नहीं हुआ - यह कानूनी निष्‍कर्ष है और डॉक्‍टर इसके बारे में निर्णय नहीं कर सकता ।'

 

10. नियोक्‍ता संरक्षण प्रदान करें

प्रत्‍येक नियोक्‍ता का यह कर्तव्‍य है कि वह अपने संगठन में इस प्रकार की शिकायतों के समाधान के लिए यौन उत्‍पीड़न शिकायत समिति का गठन करें । सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा जारी एक दिशा-निर्देश और कार्यस्‍थल पर यौन उत्‍पीड़न निवारण अधिनियम, 2012 के अनुसार, सभी फर्मों, चाहे निजी और सार्वजनिक हों, के लिए यह अनिवार्य है कि वे अपने यहां यौन उत्‍पीड़न के मामलों के समाधान के लिए इस प्रकार की समितियों की स्‍थापना करें । यह भी आवश्‍यक है कि समिति की प्रमुख कोई महिला हो और उसमें सदस्‍यों के रूप में 50% महिलाएं हों । यह भी कि समिति का एक सदस्‍य महिला कल्‍याण समूह का होना चाहिए ।

 

11. तेज़ाब डालना, पीछा करना और रति क्रियावाद भी अपराध हैं

आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2013 के अनुसार, पीछा करना (महिला की अरूचि के बावजूद उसका पीछा करना), रति क्रियावाद (प्राइवेट कृत्‍यों के दौरान महिला को देखना अथवा उसका फोटो लेना) तथा तेज़ाब डालना (महिला पर तेज़ाब डालना अथवा किसी अन्‍य तरीके से तेज़ाब देना) गंभीर और दंडनीय अपराध हैं ।